अम्बानी ने Pre - Wedding क्या इज़्ज़त बचाने के लिए करी ?
कि पुरुष को कभी रोना नहीं चाहिए। यह एक दुर्भाग्य की बात है, क्या पता किन नासमझों ने पकड़ा दिया है कि पुरुष को रोना नहीं चाहिए। यह तक की छोटे बच्चे को तुम रोने नहीं देते हो। उससे कहते हो ''रोना बंद करो, तुम क्या लड़की हो, रोती तो लड़किआ है।’’ और उस छोटे लड़के को भी अकड़ आ जाती है। लड़की तो वह होना नहीं चाहता, क्योंकि तुमने लड़की की ऐसी दुर्दशा कर रखी है कि लड़की होना एक अपमानजनक लगता है।
मैंने सुना है, एक घर में एक लड़का नौ साल का अपनी मां से बहुत ज्यादा नाराज हो गया। उसने अपने आप को बाथरूम में बंद कर लिया और दरवाजा ही न खोले। इधर मां बहुत घबड़ा गई। माँ ने लगातार दरवाजा पीटा, वह बोले ही नहीं। वह बिल्कुल सन्नाटे में खड़ा हो गया, बिल्कुल ध्यानस्थ हो गया भीतर। मां की घबड़ाहट बढ़ गई। पति दफ्तर गया हुआ है। माँ बेचारी क्या करे, क्या न करे। उसने पति को फोन किया। पति को पूरी बात बताई तब उसने कहा : '' अब तुम ही समझा लो , और निकाल लो। अब मैं आकर भी क्या कर लूंगा , अगर वह खोलेगा ही नहीं।’’ जब सरे प्रयास विफल हो गए तो उसे याद आया कि पड़ोस में एक पुलिसवाला रहता है। शायद वह डरा — धमकाकर निकाल सके। तो उसने पुलिसवाले को खबर की। जब पुलिसवाला आया। तो उसने महिला से पूछा कि कौन है। कितनी उमर का है। उसने कहा : मेरा लड़का है, नौ साल का है। पुलिस वाला दरवाजे के पास गया। उसने दरवाजे पर दस्तक दी और मधुर आवाज में बोला बिटिया, बहार निकल आ।
इतना ही सुनते ही वह लड़का एकदम दरवाजा खोलकर निकला और उसने पुलिस वाले को क्रोध भरी नज़रो से देखा और कहा : तुमने समझा क्या है? लड़का हूं, लड़की नहीं!
मगर इतनी सी बात उसे बाहर ले आई। पुलिसवाला जानता है लोगों के मन पढ़ना । उन्हीं से तो उसका चौबीस घंटे काम पड़ता है। उसने तरकीब निकाल ली—एक मनोवैज्ञानिक तरकीब कि बिटिया, बाहर आ जा। लड़का गुस्से में आ गया। उसने कहा, हद हो गई! कौन मुझे बिटिया कह रहा है। छोटे - छोटे बच्चे के मन में तुम जहर से भर देते हो। तुम उससे कहते हो : तुम लड़की थोड़े ही हो!
प्रकृति ने पुरुष और स्त्री की आंख में भेद नहीं किया। दोनों को ही आशु आते हैं। इसलिए लड़के को भी रोना उतना ही आना चाहिए जितना लड़की को। नहीं तो आंसू की ग्रंथि उतनी न बनाई होती प्रकृति ने, अगर लड़को को रोना नहीं था। लेकिन लड़को ने अपने को रोक लिया है, अपने आंसू घोटकर पीना सिख गया है। उसकी वजह से पुरुष की आंख से गरिमा खो गई है | रूखी - सुखी हो गई है। रेगिस्तान जैसी हो गई, कहि गहराई में खो गई , जादू खो गया, आंख में चमक नहीं रही, और एक परुष के चेहरे पे जो तेज़ होता है वो नहीं रहा।
तुम जानकर चकित हो जाओगे कि मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि दुनिया में दुगनी संख्या में पुरुष पागल होते हैं स्त्रियों के मुकाबले। और दुगनी संख्या में मानसिक रोगों से ग्रस्त होते हैं, दुगनी ही संख्या में पुरुष आत्महत्या कर रहे हैं। और इसके अनेको कारण हैं। और उसमे से एक कारण यह भी है कि पुरुष रोना भूल चूका है। स्त्री को जब कभी कोई भाव बहुत घेर लेता है तो वह रो लेती है। रोकर हल्की हो जाती है। आंसुओ से भाव बह जाता है।
पुरुष के पास भाव को बहाने का कोई उपाय नहीं है। सब भाव इकट्ठे होते जाते हैं, इकट्ठे होते जाते हैं—और एक ऐसी घड़ी आ जाती है कि झेलना असंभव हो जाता है। फिर कूद पड़े सत्रहवीं मंजिल से। थोड़ा रो लेते तो हल्के हो जाते।
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